आहत तो होते हैं हम!
बेशक तुम्हें दिखाते नही हैं पर आहत तो होते हैं हम,
जब भी कभी तुम दिखाते हो आँखे, सहम जाते हैं हम,
ना जाने कितनी उधेड़ बुन से गुज़र कर, देते हैं आवाज़ तुम्हें,
पर तुम्हारा वो तुनक कर बात करना, घबरा जातें है हम।
वैसे तो कान कम सुनते है, नज़रें भी हैं धुँधली,
पर आते जाते तुम्हारे चेहरे के भाव, बख़ूबी पढ़ लेते हैं हम।
माना अब वक़्त बदल गया और बदल गई ज़िंदगी,
पर याद तो करो जब छोटे से बच्चे थे तुम,
हाथ पकड़ तुम्हारा दुनिया घूमते थे, बैठाकर कंधे पर तुम्हें दुनिया दिखाते थे हम।
आज जब लड़खड़ाते है हमारे क़दम,
कहीं कुछ भूल जातें है हम , बस नाराज़ हो जाते हो!
उम्र दराज़ हो गये है, ना जाने कितनी है बाक़ी ज़िंदगी,
पर मरने की चाहत भी नही रखते है अभी।
सारी ज़िंदगी, तमाम ख़्वाहिशें तुम पर वार दी,
राजकुमारों सा तुम्हें पाला, ख़ुद बस यूँ ही गुज़ार दी,
और अब, आज!
मंगवानी हो दवा या फिर बनवाना हो चश्मा,
तुम्हें कहने से पहले सौ बार सोचतें हैं हम।
हम वो नही जो अब लम्बे चलेंगे,
अब ना ही हम लम्बे टिकेंगे,
पर जब हम ना रहेंगे और तुम बड़े हो जाओगे,
तब जो गुज़रेगी तुम पर तुम देखना तब सब समझ पाओगे,
कितने और किस क़दर असहाय थे हम,
सब समझोगे पर कुछ कर न पाओगे, बस हों जायेंगी आँखे तुम्हारी नम।
हम मौन भी रह लेते,
चुपचाप सरक लेते,
पर ये ख़त अपने बेटे को दिखा देना,
वो कुछ समझ जाए,
जो हम पर है गुज़री वो तुम पर न बीत पाये।

